एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी को वात-व्याधि के कारण अत्यंत पीड़ा का सामना करना पड़ा। फोड़े-फुंसियों से उनका सम्पूर्ण शरीर वेदना का केन्द्र बन गया। अनेक उपचार जैसे औषधियाँ, यन्त्र, मन्त्र और त्रोटक आदि अपनाए गए, परंतु रोग कम होने के बजाय लगातार बढ़ता ही गया। असहनीय कष्टों से व्याकुल होकर, अंततः उन्होंने इस कष्ट से मुक्ति पाने के लिए हनुमानजी की वंदना प्रारंभ की और ४४ पद्यों का प्रसिद्ध स्तोत्र हनुमानबाहुक की रचना की।
॥ छप्पय ॥
सिंधु तरन, सिय-सोच हरन, रबि बाल बरन तनु।
भुज बिसाल, मूरति कराल, कालहु को काल जनु॥
गहन-दहन-निरदहन लंक, निःसंक, बंक-भुव।
जातुधान-बलवान मान, मद-दवन पवनसुव॥
कह तुलसिदास सेवत सुलभ, सेवक हित सन्तत निकट।
गुन गनत, नमत, सुमिरत जपत, समन सकल-संकट-विकट॥ १ ॥
स्वर्न-सैल-संकास कोटि, रवि तरुन तेज घन।
उर विसाल भुज दण्ड चण्ड, नख-वज्रतन॥
पिंग नयन, भृकुटी कराल, रसना दसनानन।
कपिस केस करकस लंगूर, खल-दल-बल-भानन॥
कह तुलसिदास बस जासु, उर मारुतसुत मूरति विकट।
संताप पाप तेहि पुरुष पहि, सपनेहुँ नहिं आवत निकट॥ २ ॥
॥ झूलना ॥
पञ्चमुख-छःमुख भृगु मुख्य भट, असुर सुर, सर्व सरि समर समरत्थ सूरो।
बांकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो॥
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल, बिपुल जल भरित जग जलधि झूरो।
दुवन दल दमन को कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो॥ ३ ॥
॥ घनाक्षरी ॥
भानुसों पढ़न हनुमान गए, भानुमन, अनुमानि सिसु केलि कियो फेर फारसो।
पाछिले पगनि गम गगन मगन मन, क्रम को न भ्रम कपि बालक बिहार सो॥
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरिहर विधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खबार सो॥
बल कैंधो बीर रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि सार सो॥ ४ ॥
॥ सवैया ॥
जान सिरोमनि हो हनुमान, सदा जन के मन बास तिहारो।
ढ़ारो बिगारो मैं काको, कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो॥
साहेब सेवक नाते तो हातो, कियो सो तहां तुलसी को न चारो।
दोष सुनाये तैं आगेहुँ, को होशियार ह्वैं हों मन तो हिय हारो॥ १६ ॥
॥ दोहा ॥
राम गुलाम तु ही हनुमान, गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर, दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो॥
बाँह की बेदन बाँह पगार, पुकारत आरत आनँद भूलो।
श्री रघुबीर निवारिये पीर, रहौं दरबार परो लटि लूलो॥ ३६ ॥