शक्ति की उपासना का एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है, जिसकी रचना आदि शंकराचार्य जी ने की थी। यह स्तोत्र माँ दुर्गा के उस रौद्र रूप की स्तुति करता है जिसने महिषासुर जैसे महादैत्य का संहार कर सम्पूर्ण सृष्टि की रक्षा की।
इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में माँ की भव्यता, सौंदर्य, पराक्रम, करुणा और रक्षण-शक्ति का गान है। ‘जय जय हे महिषासुरमर्दिनि’ की पुकार से भरे यह छंद, भक्त के हृदय में शक्ति, विश्वास और भक्ति की दिव्य तरंगें भर देते हैं।
जो भी भक्त नवरात्रि या दैनिक उपासना में इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे भय, कष्ट, और तमोगुण से मुक्ति मिलती है तथा जीवन में शक्ति, उत्साह और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
आईए, माँ जगदम्बा को कृतज्ञता और श्रद्धा के साथ स्मरण करते हुए इस दिव्य स्तुति का संगान करें।
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 1 ॥
हे पर्वतराज की पुत्री! जो सम्पूर्ण धरती को आनन्दित करती हैं, जिनकी लीलाएँ समस्त विश्व के लिए विहार हैं, जिनकी पूजा नंदी करता है। जो विंध्याचल पर्वत पर निवास करती हैं, भगवान विष्णु को हर्षित करती हैं और इन्द्र द्वारा स्तुतिगान से वंदित हैं। हे शिवपत्नी, जो समस्त सृष्टि की माता हैं – आपको बारंबार नमस्कार है, हे महिषासुर का संहार करने वाली, सुंदर केशों वाली, पर्वतसुता!
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 2 ॥
हे देवताओं पर कृपा करने वाली माँ! जो दुर्धर्ष दैत्य को परास्त करती हैं, दुर्मुख का दमन करती हैं और स्वयं हर्ष में रमण करती हैं। तीनों लोकों की रक्षक, शंकर को संतुष्ट करने वाली, पाप का नाश करने वाली, रण की घोषध्वनि में उल्लसित रहने वाली देवी! जो दनुजों और दैत्य पुत्रों के प्रति रुष्ट हैं, अहंकारी राक्षसों का संहार करती हैं, और लक्ष्मी रूप में समुद्र की पुत्री हैं – आपको बारंबार वंदन है!
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 3 ॥
हे जगज्जननी! आप मेरे लिए मातृतुल्य हैं, कदंब वन में वास करने में प्रिय हैं और हास-परिहास में रमता हुआ आपका स्वरूप मन को मोहता है। आप हिमालय की ऊँची शृंगों में स्थित शिखरराज के मध्य अपने दिव्य धाम में निवास करती हैं। मधुर स्वरूपा, जिनकी मिठास में साक्षात अमृत भी फीका लगे – आप ही ने मधु और कैटभ जैसे दैत्यों का घमंड तोड़ा और उन्हें संहार किया। जय हो आपकी! हे रम्य केशवाली पर्वतसुता!
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 4 ॥
हे देवी! आप वह शक्ति हैं जिन्होंने युद्धभूमि में असुरों के हाथियों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया, उनके सिर और सूंड को काट गिराया। आपके सिंह ने दुष्टगजों की सूंडों को चीर डाला, और आपकी भुजाओं के प्रहार से चण्ड-मुण्ड जैसे दानवों के मस्तक भी गिर पड़े। आप भयानक युद्ध में विजयी होकर अपने भक्तों को अभयदान देती हैं। जय हो माँ! हे सुंदर केशों वाली पर्वतसुता!
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदूत कृतान्तमते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 5 ॥
हे युद्धभूमि में गर्वित शत्रुओं का नाश करने वाली देवी! जिनके पास देवों को भी चकित कर देने वाली अमोघ शक्ति है, जिन्होंने महाशिव को अपना दूत बनाकर प्रमथगणों के अधिपति के रूप में भेजा। आप पाप, दुराशा और कुटिल विचारों का विनाश करने वाली हैं। दैत्यदूतों के अहंकार का अंत करने वाली हो – हे पर्वतसुता, हे महिषासुरमर्दिनी! आपकी जय हो, जय हो!
अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शूलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 6 ॥
हे देवी! जो शरणागत शत्रुओं की पत्नियों को वीरता से अभयदान देती हैं। जो त्रिशूल से तीनों लोकों को आतंकित करनेवाले दैत्यों के मस्तक पर प्रहार करती हैं। जिनकी रण-गर्जना से देवताओं के नगाड़े “दुमिदुमि” शब्द करते हुए दिशाओं को गुंजायमान कर देते हैं—ऐसी रम्य केशधारिणी पर्वतसुता को बारम्बार नमन है।
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 7 ॥
हे माँ! केवल अपनी हुंकार से ही आपने धूम्रलोचन जैसे दानव को भस्म कर दिया। युद्धभूमि में रक्तबीज के रक्त से उपजे असंख्य असुरों को भी आपनें विनष्ट कर डाला। शुम्भ-निशुम्भ के महायुद्ध से तृप्त होकर आपने भूत-प्रेतों को भी संतुष्ट किया—ऐसी चण्डिका देवी को जय हो! पर्वतराज की कन्या को नमस्कार!
धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 8 ॥
हे देवी! जिनकी कलाई के कंगन युद्ध के संग्राम में धनुष की टंकार के संग नृत्य करते हैं। जिनके सुनहरे तरकश से निकले बाणों ने भयंकर राक्षसों को समाप्त किया। आपने समरभूमि में चारों प्रकार की सेना (रथ, गज, अश्व, पदाति) का संहार कर, विविध रूपों में प्रकट होकर शत्रुओं को चकित कर दिया—ऐसी अद्भुत शक्ति को बारम्बार वंदन है।
सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 9 ॥
हे माँ! जब सुरांगनाएँ “ततथेयी ततथेयी” करती हुई अभिनययुक्त नृत्य करती हैं, तब आप भी नृत्यरस में रमी रहती हैं। युद्ध की लय में गाया गया “कुकुथ-कुकुथ” और “गड-दा-धा” तालों से युक्त गीत आपको प्रिय है। मृदंग की “धुधुकुट-धुक्कुट-धिंधिम” ध्वनि में आप वीर रस का आनंद लेती हैं—ऐसी कला और युद्ध की अधिष्ठात्री देवी को जय हो।
जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 10 ॥
हे देवी! आप “जय-जय” के जप्य मंत्रों और स्तुतियों से सदा पूजनीय हैं। आपके नूपुरों की झंकार से भूतों के अधिपति भगवान शिव तक मोहित हो जाते हैं। आप शिव के साथ अर्धनारीश्वर रूप में नृत्य करती हैं और उस नाट्य में सुंदर गीतों का रस लेती हैं—ऐसी शिवा देवी को बारम्बार नमस्कार।
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ 11 ॥
हे माँ! आप सुमनों (पुष्पों) जैसी कोमल, मनोहारी कांति से युक्त हैं। आपकी मुखकांति रजनी (रात्रि) की चंद्रिका को भी फीकी कर देती है। आपकी आँखें भ्रमर से भी अधिक आकर्षक हैं, जिनकी शोभा देखकर भ्रमरों के अधिपति तक मोहित हो जाते हैं—ऐसी सुंदरता की साक्षात देवी को नमन है।
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १२ ॥
हे देवी! आप युद्ध क्षेत्र में कुशल मल्लों का मान-मर्दन करती हैं, जो मल्ल, तल्लिका, रल्लक आदि युद्ध कलाओं में निपुण हैं। आप पुष्पलताओं, मल्लिका और झिल्लियों से सजे वन में भिल्लिकाओं के संग रमण करती हैं। आपके चरणों से अरुण लोध्र के कोमल पल्लव भी खिल उठते हैं — हे रमणीय जटाओंवाली शैलसुते, आपको बारम्बार नमन है।
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १३ ॥
हे माँ! आप उस मदोन्मत्त गजराज के समान हैं जिसके कपोलों से मद की धारा बहती है। आप तीनों लोकों की शोभा हैं, रूप और कला की निधि हैं, और समुद्र-कन्या के समान सुंदर हैं। आप कामदेव की पुत्री सी मनोहर हैं, जिनके दर्शन मात्र से ही सुंदरियाँ भी आकर्षित हो जाती हैं। ऐसी मोहिनी रूपा देवी को प्रणाम है।
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १४ ॥
हे देवी! आपकी कांति कमलदल जैसी कोमल और निर्मल है। आपके भाल पर पूर्णिमा के चंद्रमा की सी ज्योति है। आप कला की साक्षात अधिष्ठात्री हैं, आपके साथ कलापूर्ण हंसगण भी क्रीड़ा करते हैं। आपके श्रीचरण कमल, बकुल और भँवरों से भरे कुवलय मंडलों में सुशोभित होते हैं। आपको बारम्बार प्रणाम।
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १५ ॥
हे माँ! आपकी मधुर वाणी बांसुरी की तरह कोकिलों को भी लज्जित कर देती है। आप पर्वतों की गुंजायमान कंदराओं में रमण करती हैं जहाँ पुलिंद जनों के मनमोहक गीत गूंजते हैं। आपके साथ सबरी और महाशबरी गण खेल में रमे रहते हैं—ऐसी सद्गुणों से भरपूर देवी को नमन है।
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे ।
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १६ ॥
हे देवी! आपकी कटि पर पीले रेशमी वस्त्र की आभा चंद्रमा की ज्योति को भी मात देती है। आपके चरणों के नखों की चमक से देव और दैत्यराजाओं के मुकुट में जड़े रत्न भी मंद पड़ जाते हैं। आपके उरोजों की शोभा स्वर्ण पर्वत और मदमस्त गजराज की कुंभस्थली को भी तुच्छ बना देती है। आपको शत-शत प्रणाम।
विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १७ ॥
हे माँ! आपने सहस्रों हाथों वाले शत्रुओं को पराजित कर, सहस्रों हाथों से स्तुति कराने योग्य बना दिया। आपने तारकासुर का वध करने हेतु स्कन्द (कार्तिकेय) का सृजन किया। आपने राजा सुरथ और वैश्य समाधि को भी आत्मज्ञान और भक्ति की ओर प्रवृत्त कर दिया—आपको बारम्बार नमन है।
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १८ ॥
हे करुणामयी! जो भी प्रतिदिन आपके चरणकमलों की सेवा करता है, वह लक्ष्मी के समान सौभाग्यशाली कैसे न बने? आपके चरण ही परमपद हैं—यदि मैं उनका चिंतन करता रहूँ तो फिर मुझे और क्या चाहिए, हे शिवपत्नी! आपको बारम्बार प्रणाम।
कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १९ ॥
जो भक्त स्वर्ण के समान चमकते जल से आपके पुण्यस्थान का अभिषेक करता है, क्या वह इन्द्राणी के स्तनों की मृदुलता से भी बढ़कर सुख की अनुभूति नहीं करता? हे देवियों की अधीश्वरी! मैं आपके चरणों की ही शरण लेता हूँ—आप ही में शिव का निवास है।
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २० ॥
हे माँ! आपके मुख की ज्योति पूर्णिमा के चंद्रमा को भी तुच्छ बना देती है। फिर देवलोक की सुंदरियाँ भी मेरी दृष्टि में तुच्छ क्यों न हों? हे भगवती! यदि आप कृपा करें तो मेरे भीतर शिवनाम रूपी खजाना जागृत हो जाए—आपको बारम्बार नमन है।
अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २१ ॥
हे माँ उमा! मैं अत्यंत दीन हूँ—आपको कृपा करके मुझ पर दया करनी ही होगी। आप जगत् की जननी हैं, आपकी कृपा जैसे शस्त्र बनकर दुष्टों को नष्ट करती है, वैसे ही मुझे पीड़ा से मुक्ति देनेवाली भी है। जो भी मेरे लिए उचित हो, वह कीजिए—बस मेरे संताप का नाश कीजिए।