शिव तांडव स्तोत्रम्

शिव तांडव स्तोत्रम्” लंकापति रावण द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली एवं विलक्षण स्तुति है। यह स्तोत्र उस समय की स्मृति है, जब रावण अपने अद्भुत पराक्रम एवं अहंकार के प्रभाव में आकर सम्पूर्ण कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास करता है — जो स्वयं भगवान शिव का निवास है। रावण की इस दर्पपूर्ण चेष्टा को देखकर भगवान शिव ने मात्र अपने चरण के अंगूठे से पर्वत को दबा दिया, जिसके कारण रावण का हाथ पर्वत के नीचे दब गया और वह तीव्र पीड़ा से व्याकुल हो उठा। उस पीड़ा और विवशता में रावण का अभिमान चूर हुआ, और उसने “शंकर… शंकर…” कहकर बारंबार प्रार्थना की। उसी क्षण उसके अंतःकरण में भक्ति का ज्वार उमड़ा और उसने अपने अद्भुत कंठ से भगवान शिव की स्तुति आरंभ की। यह स्तुति ही कालांतर में ‘शिव तांडव स्तोत्रम्’ के रूप में प्रसिद्ध हुई।

रावण की इस गहन भक्ति, संगीत और छंद से युक्त स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे अभय, समस्त विद्याओं का ज्ञान, अपार धन, संतान सुख तथा अष्टसिद्धियाँ और समृद्धि का वरदान प्रदान किया।

यह स्तोत्र आज भी शिवभक्तों द्वारा अद्भुत भक्ति और ऊर्जा के साथ पढ़ा जाता है और माना जाता है कि इसका नित्य पाठ करने से साधक के भीतर दिव्यता, साहस, बल और वैराग्य का संचार होता है।

ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को साहस, शक्ति, भक्ति, और आत्मबल की प्राप्ति होती है। यह स्तोत्र शिवभक्तों के लिए एक महान आध्यात्मिक साधन है, जो उन्हें भगवान शिव की कृपा का पात्र बनाता है।

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।

डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥

जिन भगवान शिव की जटाओं से प्रवाहित होती दिव्य गंगा की पावन धारा संपूर्ण धरा को शुद्ध करती है, जिनके गले में दीर्घकाल से लहराती हुई, फणधारी नागों की विशाल माला शोभा बढ़ा रही है, और जिनकी डमरू की निनाद से समस्त दिशाएँ गूँज उठती हैं — वे परम तांडवकारी, करुणासागर, शिव हमारे जीवन में मंगल, पावनता और चैतन्य का सतत संचार करें।

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि ।

धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रति: प्रतिक्षणं मम ॥२॥

जिनके मस्तक पर जटाओं में खेलती गंगा की चंचल लहरें अनुपम शोभा बिखेर रही हैं, जिनके ललाट पर प्रज्वलित अग्निशिखा दिव्य प्रकाश से दहक रही है, और जिनके सिर पर नवयुवक चन्द्रमा सौम्य रूप से सुशोभित है — उन चन्द्रशेखर भगवान शिव में मेरा हृदय हर क्षण भक्ति और प्रेम से रमा रहे।

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुरः स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।

कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

जो गिरिराजकुमारी पार्वती के मधुर विलासों में अनुरक्त हैं, जिनके मन में दिशाओं की शोभा से आनंद की तरंगें उठती हैं, और जिनकी कृपा की एक दृष्टि से ही कठिन से कठिन विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं — उन दिगम्बर, करुणानिधान भगवान शिव में मेरा मन सदा अनुपम आनंद और आश्रय पाकर रमा रहे।

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।

मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

जिनके जटाओं में सर्पों के फणों पर जड़े रत्नों की चमक दिशाओं की देवी-स्वरूपाओं के मुखों को कुमकुम सा आभासित कर रही है, और जो मतवाले गजराज की चमड़ी से बने वस्त्र को धारण करते हैं — वे भूतनाथ, रहस्यरूप शिव हमारे चित्त में अलौकिक आनंद का आवास बना लें।

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।

भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

जिनके चरणों की रज से स्वयं इन्द्रादि देवों के मस्तकों पर चढ़े पुष्प धूल-धूसरित हो जाते हैं, जिनकी जटाओं में नागराज की माला बँधी हुई है, और जिनके मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित है — वे सौंदर्य, समृद्धि और शांति के अधिष्ठाता शिव हमारे जीवन में सदा के लिए कल्याणकारी बनें।

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।

सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोजटालमस्तु नः ॥६॥

जिन्होंने अपने ललाट की प्रचंड ज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया, जिनके सामने इन्द्रादि देवता भी नतमस्तक हैं, और जिनके मस्तक पर अमृतमयी चन्द्रकला शोभायमान है — वे जटाजूटधारी, गौरवशाली शिव हमारे सिर पर सदा कृपा-संपदा बनकर विराजमान रहें।

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।

धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥

जिन्होंने अपने विकराल ललाट की अग्नि में कामदेव को आहुति के रूप में समर्पित कर दिया, और जो पार्वतीजी के मनोहर हृदय में प्रेमचित्र रचने वाले अनुपम शिल्पी हैं — उन त्रिनयन भगवान शिव में मेरी भावना सदा अनुरक्त और समर्पित बनी रहे।

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धबद्धकन्धरः ।

निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः ॥८॥

जिनके कंठ पर अमावस्या की अंधेरी रात सा घना रहस्यपूर्ण अंधकार है, जो विकराल गजचर्म धारण किए हैं, और जिनके मस्तक पर चन्द्रकला की मधुर छवि सजीव सौंदर्य बिखेर रही है — वे समस्त विश्व के आधार, गंगाधर कृपासागर शिव हमें परम ऐश्वर्य और शांति प्रदान करें।

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।

स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥

जिनके कंठ की नीली आभा खिले हुए नीलकमलों जैसी अद्भुत शोभा बिखेरती है, जो कामदेव, त्रिपुरासुर, संसार, यज्ञ, गजासुर, अंधकासुर और स्वयं मृत्यु का भी संहार कर देते हैं — उन परमशिव का मैं निष्कलंक भाव से भजन करता हूँ।

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम् ।

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥

जो संपूर्ण कल्याण की कलाओं के सुमन गुच्छ की भाँति हैं, रस माधुरी से परिपूर्ण हैं, और संहार के माध्यम से सृष्टि का संतुलन बनाए रखते हैं — ऐसे परम तत्व, सर्वविनाशक और परमपालक शिव की मैं अटूट श्रद्धा से उपासना करता हूँ।

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वसद् विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।

धिमिद्धिमिद्धिमिद्ध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥

जिनके ललाट से प्रचंड अग्नि प्रकट हो रही है, और जिनके शिरोभाग पर नागों की फुफकारों की गूंज है — उनके तांडव की लय में मृदंगों की ‘धिमि-धिमि’ ध्वनि गुंजायमान हो रही है — ऐसे प्रचंड तांडवनायक शिव की जय हो, वे ही हमारे जीवन के मंगलकारी हों।

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोः गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम् ॥१२॥

पत्थर या रत्न, नागमाला या मोतियों की माला, राजा या रंक, मित्र या शत्रु, सुंदर या सामान्य — सबमें समदृष्टि रखने वाले निष्पक्ष, निर्लेप, और अनासक्त भगवान शिव को मैं कब नित्य भज सकूंगा?

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन् ।

विलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥

मैं कब उस दिव्य क्षण को पाऊँगा जब गंगा के तट के एकांत वन में निवास करते हुए, अपने सभी दुर्गुणों को त्याग, हाथ जोड़ कर ‘शिव… शिव…’ का मंत्र जपता रहूँ और मेरी अश्रु भरी आँखों से केवल शिवमय आनंद बहता रहे?

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन् स्मरन् ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेति सन्ततम् ।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम् ॥१४॥

जो व्यक्ति इस उत्तम से भी उत्तम स्तोत्र का नित्य पाठ करता है, स्मरण करता है, उच्चारण करता है — वह सतत पवित्रता को प्राप्त करता है और सच्चे गुरु, भगवान शिव की भक्ति का अधिकारी बनता है। शिव का चिंतन ही मोह से मुक्ति का सच्चा उपाय है।

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतमिदं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१५॥

जो भक्त प्रदोषकाल में, शिवपूजन के अंत में, दशमुख रावण द्वारा रचित इस स्तोत्र का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है — उसे भगवान शंकर स्वयं रथ, हाथी, घोड़े तथा लक्ष्मी सहित अखंड समृद्धि प्रदान करते हैं, और उसकी लक्ष्मी कभी मुँह नहीं मोड़ती।

॥ इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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